दक्ष का शाप और चंद्र का क्षय
स्रोत: Bhagavata Purana, Canto 9, Chapter 3; Vishnu Purana, Book 4, Chapter 6
चंद्र ने प्रजापति दक ्ष की सत्ताईसों कन्याओं से विवाह किया था। ये कन्याएँ नक्षत्र थीं — वे सत्ताईस चंद्र-मंज़िलें, जिनसे होकर चंद्र अपनी मासिक आकाश-परिक्रमा करते हैं। दक्ष ने उन सभी को चंद्र को एक ही शर्त पर दिया था: प्रत्येक पत्नी है, प्रत्येक सम्माननीय है, और प्रत्येक को चंद्र का ध्यान समान रूप से मिलेगा।
पर चंद्र रोहिणी से प्रेम करते थे।
सत्ताईसों में से चौथा नक्षत्र उन्हें पूरी तरह बाँध लेता था। जब रोहिणी की रात होती, चंद्र वहीं ठहर जाते। जब किसी और पत्नी की बारी होती, तो वे देह से वहाँ होते, पर मन रोहिणी के पास ही रहता। शेष छब्बीस कन्याएँ कुछ समय तक चुप रहीं। अंततः दक्ष की पुत्रियाँ अपने पिता के पास गईं और अपना दुःख बताया — कि चंद्र उनके पास औपचारिकता से आते हैं, केवल रोहिणी ही उनकी सच्ची प्रेयसी है।
दक्ष ने सीधे चंद्र से बात की। उन्होंने समझाया, सत्ताईसों के प्रति कर्तव्य की याद दिलाई, धर्म का वास्ता दिया। चंद्र ने सुना और अपनी परिक्रमा पर लौटे, पर फिर रोहिणी के पास रुक गए। फिर कन्याओं ने शिकायत की। फिर दक्ष ने कहा। यह तीन बार हुआ। तीसरी बार चंद्र के न माननेपर दक्ष का धैर्य टूट गया और उन्होंने शाप दे दिया: चंद्र क्षीण होंगे। वह दीप्तिमान बिम्ब जो ब्रह्मांडीय समुद्र से उठा था, जो प्रत्येक वनस्पति को पोषण देता था, जो समस्त प्राणियों को जीवन देता था — वह मुरझाएगा, अंधकारमय होगा, और नष्ट हो जाएगा।
चंद्र मंद पड़ने लगे। रात-दर-रात अर्धचंद्र और भी पतला होता गया। इसका परिणाम तुरंत सारे जगत को भोगना पड़ा — चंद्र-अमृत के बिना वनस्पतियाँ मुरझाने लगीं, प्राणियों का मन विक्षुब्ध होने लगा, समुद्र के ज्वार-भाटे अनियमित हो गए। देवता भयभीत हुए और ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने सुनकर उन्हें शिव के पास भेजा, क्योंकि एक पितामह के शाप और सृष्टि की आवश्यकता के बीच मध्यस्थता केवल त्रिनेत्र ही कर सकते थे।
शिव ने देवताओं की विनती सुनी और हस्तक्षेप करने को तैयार हो गए। उन्होंने चंद्र को अपनी जटाओं में स्थान दिया — उन्हीं जटाओं में जहाँ गंगा भी विराजती थीं। इस कृत्य ने चंद्र को शाप के पूरे भार से आंशिक रूप से मुक्त किया। पर शाप को सीधे निरस्त नहीं किया जा सकता था — दक्ष का वचन धर्म से बंधा था। शिव ने जो दिया, वह परिहार था, निराकरण नहीं।
समाधान यह निकला: चंद्र नष्ट नहीं होंगे, पर क्षीण होंगे। कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिन वे घटेंगे, शुक्ल पक्ष के पंद्रह दिन बढ़ेंगे। वे अपनी पूरी नक्षत्र-परिक्रमा नए मन से करेंगे। और जिस शिव ने उन्हें आश्रय दिया, उनकी जटाओं में अर्धचंद्र उनकी याद के रूप में रहेगा।
इसीलिए शिव चंद्र को अपना आभूषण धारण करते हैं — यह केवल अलंकार नहीं, बल्कि इस बात का चिह्न है कि चंद्र का अस्तित्व उनकी कृपा पर टिका है। और प्रतिमास जो क्षय-वृद्धि दिखती है, वह खगोल-विज्ञान का तथ्य नहीं — एक पितामह के क्रोध, एक देव के पक्षपात, और उस करुणा की जीवंत स्मृति है जिसने एक अंत को रोक दिया।